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ध्यान

Dhyan  मन की अस्त-व्यस्तता ही मानसिक विकृतियों का कारण होती है। ध्यान में मन का मंथन होता है। ध्यान रूपी कल्पवृक्ष की सुखद छांव में जो बैठता है, उसकी सभी कामनाएँ अपने आप पूर्ण ही जाती है। ध्यान द्वारा मन एकाग्र होता है एवं उसकी चंचलता धीरे- धीरे समाप्त हो जाती है। ध्यान के क्षणों में मिलने वाला आत्मिक सुख एवं गहन शक्ति मन की सारी ग्रंथियों को तोड़ देता है और व्यक्ति अपने आप को हल्का-फुलका महसूस करने लगता हैं। जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार है । यह स्वयं ही इतना दिव्य, पवित्र और परिपूर्ण है कि संसार का कोई भी अभाव इसकी पूर्णता को खंडित करने में असमर्थ है I आवश्यकता है कि अपने मन की गहराई से अध्ययन कर उसे उत्कृष्टता की दिशा मैं उन्मुख करने की।

    ईर्ष्या, द्वेष, लोभ एवं अहम के दोषों से मन को विकृत करने के बजाये अपनी जीवनशैली को बदलकर सेवा, सहकार, सौहार्द जैसै गुणों के सहारे मानसिक रोगों से बचा जा सकता है और मानसिक क्षमताओं को विकसित किया जा सकता है।

    ध्यान से तुम्हारे जीवन की दिशा ही बदल जाएगी । ध्यान एक ऐसा शक्तिशाली उपहार है कि केवल पाँच मिनट करने में घंटों, दिनों और कभी-कभी वर्षों के निषेधात्मक चिंतन निरस्त हो जाते हैं ।

 

»» ध्यान की कुछ विधियाँ (Methods of meditation)