दीक्षा की गोपनीयता --

    दीक्षा का महत्व भी अपने स्थान पर है। बिना दीक्षा के भी ध्यान के मार्ग पर उतरा जा सकता है। लेकिन दीक्षा लेने से साधना में गुणात्मक वृद्धि हो जाती है। जैसे किसी भी भूमि पर कोई भी बीज उग सकता है। लेकिन यदि बीज के अनुसार भूमि का चुनाव करके यदि कोई कृषक विधिवत बीज बोता है तब फसल अच्छी उगती है। उसी प्रकार एक योग्य गुरू इच्छुक साधक के अनुरूप ध्यान साधना का चुनाव करता है। इच्छुक व्यक्ति की ग्रहण शक्ति, बौद्धिक स्तर सजगता, लगन और उसकी व्यस्तता देखते हुए उसके पूर्व जन्म के संस्कार उसके अन्दर की चेतना और आभामण्डल के अनुसार प्रक्रिया को उसके अनुरूप ढाल कर नियमत: और धीरे-धीरे तप की भूमि में प्रवेशा कराता है। गुरू के लिए नियम से अधिक साधक महत्त्व रखता है। इच्छुक व्यक्ति का मानसिक अनत्यपरीक्षण करके गुरू विधियों को उसके अनुरूप बनाता है। यही कारण है कि दीक्षा को गोपनीय रखने का प्रचलन हुआ। दीक्षा की प्रक्रिया किसी से भी कहना वर्जित है। प्रत्येक व्यक्ति का व्यक्तित्व और उसकी ग्राह्यता अलग-अलग होती है। अत: एक ही प्रकार की दीक्षा सभी प्रकार के व्यक्तित्व पर काम नहीं करेगा। मानसिक भिन्नता के कारण दीक्षा विधि भी भिन्न-भिन्न होती है। अस्तु दीक्षा वैयक्तिक वस्तु है। भीड़ में जो आज दीक्षायें दी जा रही हैं वह किसी काम की नहीं है। वह तो सस्ती लोकप्रियता है। दीक्षा गुरू और शिष्य के मध्य वैयक्तिक विचारों का सम्प्रेषण है। यही सम्प्रेषण 'शक्तिपात' है। लेकिन 'शक्तिपात' होने मात्र से नहीं होगा। गुरू जितना भी चले तुम नहीं पहुँच पाओगे। इसलिए चलना तो तुम्हें स्वयं पड़ेगा। जब तक तुम चखोगे नहीं गुड़ की मिठास पहचान नहीं पाओगे।

guru   यहाँ आवश्यकता होती है योग्य गुरू के तलाश और पहचान की। जिसकी वाणी और कार्य में, जिसके सिद्धान्त और जीवन शैली में एकरूपता देखना उसे ही गुरू मानना। गुरू की व्याख्या मैंने प्रथम खण्ड में की है। उसे ध्यान में रखना। यहाँ सिर्फ इतना ही कहूँगी कि प्रथम गुरू शिव और प्रथम शिष्या पार्वती के होने का तात्पर्य भी है। वास्तव में यह प्रतीकात्मक है। यहाँ पार्वती उनकी पत्नी नहीं है बल्कि शिव का ही स्त्रैण अंश है। गुरू और शिष्य में इतनी ही श्रद्धा और विश्वास होनी चाहिए कि वह दोनों की वैचारिक संधि शिव और पार्वती की भाँति हो जाय। यदि इस संसार कोई अध्यात्मिक गुरू तुम न खोज पाओ तब निश्चय उस शिव को गुरू मान लेना वह शिव आज भी गुरू है। नीचे 'सहज योग' साधना की विधि दी जा रही है। जिसका प्रथम प्रयोग घर में स्वयं भी किया जा सकता है। इसके करने से और कुछ हो या न हो कम से कम मानसिक दृढ़ता और शान्ति तो अवश्य प्राप्त होगी। आज अधिकांश बीमारियाँ मानसिक हैं- इन मानसिक बीमारियों में कमी अवश्य आयेगी।

   सहजयोग साधना में उतरने के पूर्व निम्न शर्तों के पालन करने का प्रयास करें-

   एक संकल्प पत्र तैयार करो और अपने सोने के स्थान में ऐसी जगह पर टांगो कि सुबह आँख खुलते ही उस पर तुम्हारी दृष्टि पड़े। ठीक उसके उपर अपने इष्टदेव गुरु/माता/पिता की तस्वीर लगाओ।

   संकल्प - आज के दिन

  1.     मैं क्रोध नहीं करूँगा।
  2.     झूठ नहीं बोलूँगा।
  3.     कम से कम बोलूँगा।
  4.     हृदय से सुनूँगा।
  5.     कोई एक अच्छा काम करूँगा।


   प्रत्येक सुबह संकल्प दुहरा कर दिन-चर्या आरंभ करो। दिन भर तुम्हारे चेहरे पर गंभीर मुस्कुराहट हो। अश्लील मजाक न करो। किसी भी वस्तु को स्थिर नेत्रों से देखो। रात्रि में सोने के लिए जब बिस्तर पर जाओ तब लेटे ही लेटे सुबह से लेकर अब तक की एक एक बातों को क्रमवार याद करने का प्रयास करो।

    मनुष्य के भृकुटि के मध्य एक त्रिनेत्र होता है। वह बन्द रहता है। यह तृतीय नेत्र ही शिव नेत्र है। जो न केवल भारतीय परम्परा के शिव के पास हैबल्कि सभी मनुष्य के पास है। जरूरत है उसे खोलने की। इसके खुल जाने से बिना देखे हुए तुम देख सकते हो। बिना सुने हुए सुन सकते हो। बिना कहे हुए कुछ कह सकते हो। अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों की जो सीमित शक्ति है उसमें वृद्धि हो जाती है। यह विधि भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से कल्याणकारक है।

    'सहज योग' साधना में तुम्हें अपनी आती-जाती श्वांस के प्रति हर क्षण सजग रहना है। श्वांस कब अन्दर आ रही है और कब बाहर जा रही है। ऐसी सजगता बनाये रखने से तुम दृढ़ता प्राप्त कर लोगे और अपने सहस्रसार चक्र से अपने ध्यान को प्रवेश करा कर शरीर के एक अंग को अलग-अलग एक-एक इंच पर अपनी दृष्टि डालते जाओ- देखते जाओ। एक दिन वह महाघटना घटित हो जायगी - तुम सत्य को उपलब्ध हो जाओगे। इस सहजयोग साधना को नियमपूर्वक लगातार करने से शीघ्र उच्चतर अवस्था जिसे ब्राह्मी अवस्था कहते है प्राप्त कर लोगे। लेकिन सांसारिक लाभ हेतु कभी भी, कहीं भी और किसी भी स्थिति में की जा सकती हैं। तात्कालिक लाभ के रूप में मानसिक शक्ति बढ़ जायेगी- शरीर के छोटे-मोटे किसी भी प्रकार के रोग में कभी आते हुए एक दिन समाप्त हो जायगा। स्मरण शक्ति में गुणात्मक वृद्धि होगी। इड़ा और पिंगला सांसें ही तो रस्सी है मूलाधार ही महासागर है जिसका मंथन इड़ा और पिंगला से करने पर सभी रत्नादि प्राप्त होंगे। लक्ष्मी, सरस्वती सभी की प्राप्ति होगी। समुद्र मंथन का यही रहस्य तो है।

   अन्तश्वेतना ही जीव का प्रमुख आधार है। मंत्र, जप, तप, पूजा, हवन, ध्यान, नमाज़, नमन का एक ही लक्ष्य है अन्तश्चेतना में वृद्धि और अनुभूति। घर-गृहस्थी और परिवार के दायित्वों का निर्वाह करते हुए दिन-रात ध्यान योग पूजन-सत्संग करना कदापि संभव नहीं है। न ही कर्त्तव्यों से विमुख हो गृहत्याग कर जंगलों में भटकना ठीक है। इस दृष्टि से यह निम्न ध्यान-साधना अति सरल और साधु संन्यासियों के साथ-साथ गृहस्थ स्त्री-पुरुषों के लिए उपयोगी और सरल साध्य है।