ध्यान की विधियाँ

  • विधि नं० 1 :  

    मध्यम प्रकाश वाले कमरे में आराम से लेट जायें। स्वयं को आत्मकेंद्रित करें। अपना सम्पूर्ण ध्यान आज्ञा चक्र पर ले जायें। थोड़ी देर अपना ध्यान आज्ञा चक्र पर ठहरने दें। त्रिनेत्र में सम्मोहन शक्ति होती है। जैसे ही आपका अवधान त्रिनेत्र पर जायगा वह वहीँ ठहर जायगा। आपको सुखानुभूति होगी। अब अपने ध्यान को आज्ञा चक्र से धीरे-धीरे नीचे उतारते हुए दायें हाथ की कनिष्ठा तक लायें। ध्यान रहे जब आप सांस ले रहे हों तब ध्यान आज्ञा चक्र से कनिष्ठा तक लायें और जब श्वांस छोड़ रहे हों अपने ध्यान को पुन: कनिष्ठा से धीरे-धीरे अपने आज्ञा चक्र पर ले जायें यह क्रिया दोनों हाथ और दोनों पैरों की अंगुलियों के बाद शरीर के चक्रों पर करें। यह प्रक्रिया कम से कम तीन बार करने के पश्चात अपने ध्यान को आज्ञा चक्र से मूलाधार चक्र तक प्रवाहित करते रहें। जब ध्यान तोड़ना हो स्वयं को वातावरण से जोड़ें और धीरे-धीरे आँखें खोलें।

  • विधि नं० 2 :

    हलके प्रकाश वाले कमरे में सुखासन में बैठ जायें। बेहतर होगा यदि कमरे में मधुर वाद्य चल रहा हो। 15 मिनट तक अपने अंतर को रीता करने का प्रयास करें। आँखें बंद होनी चाहिए। 15 मिनट के बाद जलते बुझते नीले प्रकाश वाले बल्ब को एकटक निहारत रहें। बल्ब का जलना बुझना आपके ह्रदय गति से सात गुना ज्यादा होना चाहिए। पुनः 15 मिनट के पश्चात आँखें बंद कर लेट जायें और निष्क्रिय रहें। विचारों से तादात्म्य स्थापित न करें। 

  • विधि नं० 3 :

    अपने आज्ञा चक्र पर ध्यान लगायें। जब ध्यान एकाग्र हो जाये सहस्रसार के ब्रह्मरन्ध्र पर ब्रह्माण्डीय ज्योतिर्मय ऊर्जा की धारा को बरसते हुए महसूस करें और फिर अगले कुछ दिनों के अभ्यास के बाद इस ऊर्जा को ब्रह्मरन्ध्र से अपने अन्दर प्रवेश करायें। वास्तव में यही ब्रह्माण्डीय शिवजी की गंगा है जो शरीररूपी पर्वत की चोटी कैलाश पर गिरती है। कैलाश की चोटी सहस्रसार चक्र है। यह साधना एक बैठक मैं तभी तय करें जब तक कि कोई तनाव पैदा न हो या भय महसूस न हो।

  • विधि नं० 4 :

    कमर से गर्दन सीधी रखो। आँखें बन्द कर लो। अपने ध्यान को अपने भृकुटी के मध्य धीरे-धीरे चारों ओर सरकने दो। किसी एक बिन्दु पर तुम्हारा अवधान टिक जायगा और तुम्हें सहज सुख की प्राप्ति होगी। वहाँ से ध्यान हटाने की इच्छा नहीं होगी। बस उसी बिन्दु पर तुम्हारा तीसरा नेत्र है। यह आवश्यक नहीं कि सभी का त्रिनेत्र बिल्कुल मध्य में हो। इसलिए अपने त्रिनेत्र को दूंढ़ना पड़ता है। जब मिल जाय तब अपना ध्यान उस पर टिका दो और साक्षी भाव से निहारते रहो घटने दो जो घटता है। विचारों के साथ तालमेल नहीं होनी चाहिए। तुम अनन्त में पहुँच जाओगे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड - समस्त लोक तुम्हारे ही अन्दर है उस पर विजय पालोगे।

  • विधि नं० 5 :

    'सहज साधना' है। यह साधना सहज श्वास और योग निद्रा का मिश्रित रूप है। इस विधि में निरन्तर अपने ध्यान को श्वास प्रक्रिया पर टिकाये रखना है। अर्थात् अपनी श्वासों के प्रति हमेशा सजग रहना है और अपने शरीर के एक-एक हिस्से को अन्तर्नेत्र से देखते हुए जागृत करने की विधि है। इस विधि से पूर्व जन्म के पाप भी नष्ट हो कर इस जीवन के सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है और अन्तत: जीव मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।