सहज योग साधना

   'सहज योग साधना' न तो कोई धर्म है, न कोई पंथ है, न कोई परम्परा है और न ही कोई शारीरिक योग है। यह अपने ही अन्दर निहित उर्जा को जागृत करने की सहज प्रक्रिया है जहाँ- 'अहं ब्रह्मास्मि' क्री अनुभूति होती है। त्रितापों से पीड़ित मानव जन्म-जन्मान्तर से मुक्ति के लिए छटपटा रहा है। कथित चौरासी लाख योनियों में भटक रहा है। यहाँ संदेह उठ सकता है कि चौरासी लाख योनियों को बात कहाँ तक सत्य है ! यहाँ यह जानो कि जो ज्ञान अनुभव जन्म है- इन्द्रियातीत है उसे इन मात्र पांच ज्ञानेन्द्रियों से सहज ही कैसे जाना जा सकता है। इसलिए किसी तथ्य को जानो। मानने से कुछ नहीं होगा। जानने के लिए इस मार्ग से गुजरना ही होगा। यही मार्ग है 'सहजयोग साधना'-  जिस पर निरन्तर चलते रहने से दैविक, आधिदैविक और अधिभौतिक त्रितापों से सहज मुक्ति मिलेगी।

meditation

   यह साधना सरल, वैज्ञानिक और मानसिक प्रक्रिया है। इसमें न तो कोई अधिक शारीरिक परिश्रम करना पड़ता है, न किसी विशेष शिक्षा या डिग्री की आवश्यकता पड़ती है, न ही गृहस्थ जीवन का त्याग करना पड़ता है। इसे वृद्ध, बच्चे और अस्वस्थ व्यक्ति भी कर सकता है इस वैज्ञानिक युग में यथार्थता का परीक्षण अनिवार्य है। इस अत्याघुनिक युग में भी जितने यंत्र उपकरण बने  हैं वे सभी के सभी स्थूल हैं- स्थूल का ज्ञान देते हैं। मनुष्य के सीमित क्षमता के परिणाम हैं ये यंत्र। ये उपकरण वास्तुपरक हैं जिससे वाह्य ज्ञान संभव हैं। आत्मपरक ज्ञान का कोई उपकरण नहीं बना। आत्मपरक उपकरण एक मात्र 'साधना' है। जिस तरह तुम्हारी क्षुधा तभी मिटती है जब तुम भोजन करते हो उसी प्रकार इसे प्राप्त करने के लिए तुम्हें स्वयं चलना होगा। यही चलना 'सहयोग साधना' है। इस मार्ग पर चलकर आन्तरिक शक्तियों को विकसित कर सम्पूर्ण प्रकृति और ब्रह्माण्ड पर विजय प्राप्त किया जा सकता है।

   इस सरल स्वाभाविक और विशेष प्रयासहीन साधना द्धारा चेतना की उच्चतर अवस्था विकसित होती है। आज की अकूल-अनन्त समस्याओं निराकरण यही सहजयोग ध्यान साधना में है। यह वैज्ञानिक और क्रमबद्ध प्रक्रिया है।

   सहजयोग क्यों कहते हैं ? सहजयोग में ब्रहा का तात्पर्य वेदों के उस आदि सत्य से है- बौद्धों के शून्य से है- जैनों के चैतन्य से है- सांख्य के प्रकृति-पुरुष से है और शंकराचार्य के समष्टिगत आत्मा से है। अपने ड़न्दियों को नियंत्रित कर लेने से अपनी उस आत्मा का बोध होता है जो ब्रह्म है। ब्रह्मस्वरूप है। उस ब्रहा के बोध की स्थिति का अभिप्राय सहजयोग से है। चिंतन के लिए किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती। यहाँ चिन्तन एक स्थूल प्रक्रिया है जिसे सोचना कह सकते हैं। सहजयोग साधना से इस 'सोचना' को शिथिल करते हुए शून्य कर दिया जाता है। तब मानव मस्तिष्क में 'स्व' की अनुभूति होती है। वही 'स्व' जो ब्रहा है - अर्थात्, 'ब्रह्मास्मि' की अनुभूति होती है।

   साधना द्वारा मन को शान्त करते हुए शान्ति की जड़ तक पहुँचाया जाता है अर्थात् जहाँ से विचार उठते हैं। जमीन बंजर हो जाये तो सोच का पौध कहाँ से विकसित होगा ? विचारों की प्रक्रिया में लाखों की संख्या में न्यूरॉन्स क्रियाशील होते हैं। साधना द्वारा जब मन शान्त होता है तब न्यूरॉन्स की उत्तेजना कम होती है और मन-मस्तिष्क को विश्राम प्राप्त होता है। इसी विश्राम से आभ्यंतर शक्ति में वृद्धि होती है।

   जागृत अवस्था, स्वप्नावस्था और सुषुप्ति की चेतना साधना की तीन अवस्थायें हैं। ब्रह्मयोग की अवस्था चतुर्थ अवस्था है जब शरीर निष्क्रिय हो और मन पूर्ण चैतन्य हो। माया-मोह-इच्छा से परे शुद्ध-शुद्ध सतत् चैतन्य। इस अवस्था को ब्राह्नी अवस्था अथवा अद्वैतावस्था कहा जाता है। इस अवस्था में आने पर जीव और ब्रह्म एक हो जाते हैं। इस अद्वैतावस्था तक पहुँचने की यह सहज प्रक्रिया है इसलिए मैंने इसे 'सहज योग' कहा है।

   मैंने ध्यान की एक किरण भर दिखलाई है। इसके बाद तुम्हें स्वाद लग जायगा और तुम सराबोर हो उठोगे। ज्ञान की गंगा धारा शिव की जटा से निकले गंग की धारा कि तरह तुम सराबोर हो उठोगे। ज्ञान की यह गंगा जगत के लिए भी कल्याणकारी होगा और तुम्हारे लिए भी। शिव की जटा से निकली गंगा यही तो है।

   यहाँ यह संदेह हो सकता है कि विधि इतनी छोटी, इतनी सरल और उपलब्धि इतनी बड़ी? यह कैसे संभव है ? लेकिन अणु जितना छोटा होता है उतना ही शक्तिशाली होता है। ये छोटी-छोटी विधियाँ भी आणविक हैं। इस पर चल कर देखो। मेरी बातों को मान कर नहीं इन्हें जान कर देखो। इन्हीं विधियों के कारण भारत विश्व में आध्यात्मिक गुरू रूप में प्रतिष्ठित था। हमें पुन: उन्हें जीवित करना है। ध्यान-विधियाँ।

   जो विधियाँ हिन्दुस्तान की हैं आज हम उन्हें ही विदेशों से आयात कर रहे हैं। इन्हीं विधियों से तो कभी भारत ज्ञान धर्म गुरू के रूप में प्रतिष्ठित था। इन विधियों को पुनर्जीवित करने का एक उपाय है- समग्र प्रेम और सम्पूर्ण समर्पण जबतक तुम मन के बस में रहोगे तुम्हारा मिलन सत्य से नहीं होगा।

   भूल जाओ सब कुछ और सत्य को पालोगे। स्वयं को भूलना जरूरी है। 'स्व' के साथ प्तत्य का सम्बन्ध नहीं हो सकता है। जिस क्षण तुम स्वयं को भूल जाओगे सत्य उपलब्ध हो जायगा। तुम सत्य स्वरूप हो जाओगे वैसे ही जैसे चीनी की गुड़िया समुद्र की गहराई मापने आये तो स्वयं समुद्र में मिलजायगी। वह परमात्मा वह सत्य कोई बाहर की वस्तु नहीं जिसे प्राप्त करोगे - वह तो तुम्हारे ही अन्दर है - उसे उपलब्ध होना है- तुम्हारे ही अन्दर से -

कस्तुरी कुण्डल वसै मृग ढूढै बन माही
ऐसे घटि-घटि राम हैं दुनियाँ देखै नाहीं।

यह प्रेम और समर्पण सत्य के साक्षात्कार से संभव है।